प्रेम से परमात्मा का संबंध

 प्रेम से परमात्मा का संबंध यानी प्रेम ही ईश्वर है बिना प्रेम के ईश्वर का साक्षात्कार करना असंभव है प्रेम है तो ईश्वर है प्रेम नहीं तो ईश्वर को प्राप्त करना देख पाना चहाना व्यर्थ है प्रेम दो आत्माओं का मिलन होता है शारीरिक संबंध बनाना नहीं प्रेम बहुत वर्षों से बिछड़ी हुई आत्माएं होती हैं जो एक दूसरे के लिए तड़प पैदा हो सकती है प्रेम सेक्स से बहुत दूर है अगर प्रेम होगा तो निरंतर पुरातन अनंत काल तक चलता रहेगा और अगर प्रेम नहीं होगा तो शरीर से मोह कुछ समय तक रहेगा और कुछ समय के बाद वह दूर हो जाएगा प्रेम कोई बुरी चीज नहीं है प्रेम अमृत है जिसे जो पीता है वह आनंदमय हो जाता है जैसे की कोई अगर ईश्वर को जान ले पहचान ले डूब जाए तो उसे संसार की कोई भी चीज इतनी सुहानी नहीं लगती जितना कि ईश्वर लगता है ठीक ऐसे ही अगर जिसे प्रेम किया बड़ी पूर्णता से प्रेम किया तो वह प्रेम को ही चाहेगा प्रेम को कभी बुरा नहीं रहेगा प्रेम बुरा है ही नहीं तो बुरा कहेगा क्यों प्रेम के दो रूप हो सकते हैं पहले दर्द बहुत पीड़ा दूसरा आनंद और जो पीड़ा को सह ले और वह पीड़ा मीठी होती है लेकिन मीठी भी इतनी भयानक होती है कि कोई कोई इसे सहन नहीं कर सकता जैसे की मीरा ने सहन की राधा ने सहन की और भी प्रेमी भक्ति हुए हैं जो ईश्वर को पाया है जिन्होंने अपने प्रेम केवल बूते है प्रेम परमात्मा है प्रेम ईश्वर है प्रेम जगत है प्रेम संसार है प्रेम से ही सारा संसार बनता है और बना है बिना प्रेम के इस संसार का निर्माण नहीं हो सकता प्रेम निर्माण करता है बाकी सब विध्वंस होता है प्रेम जोड़ता है प्रेम मिलाता है प्रेम रस है प्रेम फूल खिलाता है प्रेम जड़ है और उसके आसपास तने हैं जो प्रेम करता है वह देना जानता है मांगना नहीं जो प्रेम करेगा वह देगा कुछ मांगेगा नहीं वह कहेगा तुम मुझे रख लो मुझे कुछ मत दो मैं मैं तुम्हारा हूं तुम मेरा जो कुछ भी चाहो करो जिससे प्रेम किया जाता है हम उसी के हो जाते हैं और वह हमारा मालिक बन जाता है प्रेम में गुलाम बना भी एक मलकियत होती है

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